सहसा गूंज उठी कानो में मेरे ह्रदय विदारिणी ध्वनि मेघो की

सहसा गूंज उठी कानो में मेरे
ह्रदय विदारिणी ध्वनि मेघो की
देखा तब पलभर मै ऊपर
थी आ रही बारात काले बदलो की
ध्वनिया गूंज रही उनकी ढोलक सी
बीच-बीच में स्वप्रकाश से
करते है अपने मार्ग को प्रशस्त
लगे चहकने खग-कुल भी
दिवा प्रतीत होने लगी कृष्ण निशि सी
हो गयी शुरू अमल धवल जल की धार
हो गए प्रफुल्लित नरगण भी
हो उठा तरंगित हिय कृषको का भी
है प्रतीत होती वर्षा की बुँदे
निर्मल मोती के कणों सी
हो उठी रसशील नीरस वसुधा भी
जल का आरोहावरोह लगा होने
पड़ने लगी कण्टक सी मूसलाधार
लगी झर-झर झरने नीर की हार
होने लगा प्रतीत शस्य-श्यामल जग
खगकुल भी इन वर्षा की बौझारों से
छिप गए जाके अपने घरों में
चल-दल भी झूमने लगे मस्ती में
देखते-देखते प्रतिपल में ,
होने लगी जलमग्न खेतो की कतार
देख वरुणदेव की कृपादृष्टि
नरजनो के प्रार्थ में हुई न त्रुटि
खग-गणों ने किया मधुर नाद
होता है प्रतीत जैसे बांटते हो
वे प्रसन्नता के प्रसाद …

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