देखकर अरुणोदय की मधुर लालिमा

देखकर अरुणोदय की मधुर लालिमा
होने लगा विलीन गगन में
तिमिरो का चमकता प्राण
हो गया निष्प्रभ इंदु भी
छिपने लगा तमिस्र नभ में
सुनहले लाल अरुण कान्ति से
खग-कुल के कलरव गीत उठे
हुआ मिलान चकवा -चकवी का
हो उठे प्रफुल्लित पंकजगण भी
हुआ नर कर्मरत ,हो मुक्त आलसपन से
ओंस की बुँदे अरुण कान्ति से
होती है प्रतीत कनक की लरियों सी
कोमलता का संचार हुआ
देखकर अरुणोदय की मधुर लालिमा …
वसुधा भी हो उठी धन्य
देख प्रांची में सुनहला रंग
भर गया जन-जन में उमंग
तब तक दिखाई दे गया
सकल सृष्टि का दीपमान
हुआ प्रतिबिंबित दरिया में भी
किया अपनी अनुपमीयता से ,
नागाधिराज का अद्वितीय मन
ऊँचा उठने लगा गगन में वह
सुन विटप के प्रार्थ-गान
देखकर अरुणोदय की मधुर लालिमा …

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