दहेज़ की इस लालसा ने मानव को कर दिया अँधा

दहेज़ की इस लालसा ने
मानव को कर दिया अँधा
संसार की मानवता को
बना दिया एक धंधा
हो गया कितना निर्लज्ज यह मनुष्य
धन के इस लोभ से हुई न उसकी तृप्ति
जरा सोचे हर कोई इस पर
अपने शरीर के टुकड़े को ही
जिसको प्यार किया पाला पोषा जीवन भर
सौदा कर दिया उसी का कुछ पैसो पर
सोचे जरा इस पर एक बार
है बेटियाँ हमारे भी पास
हमारे ही पापों के बोझ ,
संयोग न हो की एक दिन
थोपे जाये कहीं इन प्यारो पर,
गौरव मंडित अपनी मर्यादा को
करे न इस तरह छिन्नतार
बन ना जाये धनलोभी हम इस धन के खातिर
पात्रता न हो जाये हमारी हास-परिहास की
इस ठंडी अंधी अनल की ज्वाल
कर दे न हमारे अपनों में अंतराल
बहाये हम संतोष रूपी नीर की दरिया
दुसरो की आँखों में भी हो ख़ुशी
उनमे ही हो मेरा मस्त हाल
परित्यक्त कर इस यौतुक की दुनिया को,
रखे हम मानवता की लाज
मस्त रहे अपनी इस प्यारी दुनिया में
मिले हर किसीको हम से सिख
करे संकल्प छोड़ने को इस लालसा की
और खुद को सच्चे आदर्शो से जोड़ने की
कर दे ज्ञान से हर किसी को आलोकमय
फिर तो सच्चा है ये जीवन
और इसके जीने का राग …

Leave a Reply