स्वच्छंद हुए उन अधरों से

स्वच्छंद हुए उन अधरों से ,
कुछ कहने को दिल करता है
अश्क़ो से भीगे उन नयनो से
कुछ सुनने को दिल करता है ,
उठती है एक ज्वाला हर पल
तपते इस अंतर्मन में
बहता है एक सैलाब यहाँ,
विदीर्ण हुए इन हृदयों में
इतिहास गवाह बन आता है
पर प्यार में बेबश इंसा न कुछ कर पाता है ,
उड़ रहा पापी ये मन ,
निश्छल जीवन के परो से
स्वच्छंद हुए उन अधरों से …
ना अब मांगे है गुलाब
और ना चाहे है शबाब ,
ना कोई बिछड़ने का डर अब,
हर पल अब आज़ाद है ,
दूर हुआ संशय मेरा
भ्रमित हुए इन हृदयों से
होता नुकसान इसमे था पता
पर सारा अपना होता है ,ये ना था पता
सब भूल गए उन लम्हों को
पर ना भूल पाये उनकी यादों को ,
हर वक़्त विरह के अंगारो से
प्रति पल ये दिल अब जलता है
स्वच्छंद हुए उन अधरों से .
कुछ कहने को दिल करता है …

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