दस्तक

दस्तक

दे दी दस्तक तूने कान्हा
अब और. कहाँ मुझे आना जाना
जिसको देखा अपना माना
फिर कैसा यह तना बना
इक झलक तेरी जो पाई मैंने
अब तक तुम्हे था न पहचाना
रहती नज़र सब पर तेरी
नहीं उसमें कोई हेरा फेरी
करता धर्ता जब खुद को माना
कुछ न पाया तब भेद यह जाना
बिन तुम्हारे है कहाँ ठिकाना
आज आएं हैं तो कल है जाना
है दुनिआ रंग बिरंगी माना
पर अब तुझको संगी है माना
तू ने खेल कैसे खेले रे कान्हा
मोह लिया मन जब हमने जाना
है बस में तेरे दुनिआ सारी
अब सुध हमारी भी लेलो मुरारी

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 28/08/2015
  2. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 29/08/2015

Leave a Reply