संभल जाती है ज़िंदगी

गिर गिर कर फिर संभल जाती है ज़िंदगी |

हर हालात में मुस्कुराती है ज़िंदगी ||

मेरी हार पर जब-जब आँख रो देती है,

तब मुझे फिर चलना सिखाती है ज़िंदगी ||

अँधेरों से रोज पड़ता है पाला मेरा,

हर रोज मुझे राह दिखाती है ज़िंदगी ||

बुत हम भी थे बुत वो भी थे पत्थर के मगर,

मुझे पिघला अब उन्हें पिघलाती है ज़िंदगी ||

क्या है मेरा अपना जिस पर इतराऊँ मैं,

मेरे वजूद को मुकाम दिलाती है ज़िंदगी ||

# महेश कुमार कुलदीप ‘माही’

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 28/08/2015
  2. mkkuldeep mahesh kumar kuldeep 31/08/2015

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