बेचारी ।

बेचारी ।

वह बैठी थी,
रास्ते के किनारे ,
आंखो से नदी बह रही थी,
सब आ जा कर रहे थे,
उसे देख कर अंदेखा कर रहे थे,
सोंचा की उसके पास जाउं,
जाकर पूछूं क्या हुआ,
पर साहस न हुआ ।
हम भी उसे देख रहें थे,
और वह,
किसी की भी परवाह न कर,
कुछ गुनगुनाए जा रही थी,
ईश्वर को बूलाए जा रही थी,
आंसू गिराए जा रही थी,
दर्द सुनाए जा रही थी,
पर किसी को जरा भी ख्याल नहीं,
मैं भी वहां से चला आया,
क्योंकि यह समाज ही मुझें वहां से,
हटाते जा रही थीं ।

— संदीप कुमार सिंह ।

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 28/08/2015
    • संदीप कुमार सिंह संदीप कुमार सिंह 29/08/2015
  2. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Er. Anuj Tiwari"Indwar" 10/10/2015

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