तुम से मिलता हूं गोया जहां पूरा समा जाता हो

पहाड़ से मिलता हूं
मिलता हूं
जंगल से भी।
जब भी गले लगाया
किसी मोटे बिरिछ को तो लगा
तुम्हीं में समा गया गोया।
काले थे या गोरे
रंग उनके
कहां मायने रखता अब
बस गले लगा लो
तो लगता है अपने ही तो हैं।
वैश्विक दुनिया में
लगाने को गले मचलता है मन
उन वर्ण को भी जो हमारे यहां क्रीम से साफ करना चाहते हैं
धो देना चाहती हैं पैदाइशी रंग
क्या सांवला और क्या गौर
जब भी मिला करता हूं किसी गैर से
वो अपना सा ही लगता है।
अब क्या बात करें उनकी
जो कहा करते थे
हमीं तो हैं दुनिया तुम्हारी
हमीं से तो रिश्ते अर्थवान हुआ करते हैं
वे शब्द अब खाली खोखले से लगते हैं
लगते हैं वे चुनावी घोषणाओं से
ग़र कैसे हो सकता था
दर्द में तड़पे कोई
आप टपका दें
एक मैसेज
गेट वेल…
और इधर मेरा बुखार उतर जाए।
इन दिनों लगने लगे हैं वहीं लोग प्यारे
जो अपने न थे
ना ही जिनकी पहचान थी
लेकिन क्या हुआ बता सकते हैं?
क्योंकर कोई ग़ैर अपनी ओर खींचने लगा
बरबस उसकी आंखों से टपकते लोर अपनी ओर खींचते हैं।

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/08/2015
    • kaushlendra 27/08/2015

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