मेरा मन

तू है मेरा भोला सा मन
जैसे कोई मुस्कराता उपवन

रंग बिरंगी इसकी हर क्यारी
मैं खुद ही इस पर बलिहारी
रहती बसंत ऋतू सी सुंदरता
शहद सी भरी है मधुरता

पुष्प पराग भँवरे पीते
मगर पुष्प काँटों में जीते
दुनिया की कटु वाणी झेलता
फिर भी नमन करती हर लता

सुखद एहसास की मंद पवन
हरियाली ढूंढ़ता इसका आँगन
मुस्कराता है दुनिया के तानो में
अपनापन ढूंढता है बेगानो में

सब में समदर्शी भाव है रखता
इसीलिए बार बार है तू दुखता
गगन स्पर्श के सपने लिए
पल पल टूटे सपने सीए

हर पल ठुकराता वर्तमान की रीत
पल पल हारता , पर ढूढ़ता है जीत
करुण पुकार से है मुरझाता कोना कोना
ज्यों माली भूल गया हो पानी देना

ठोकर खाता , गिरता और फिर सम्भलता
दुखता ,रोता मगर बनी रहती शीतलता
औरों के हित को तैयार रहता
संवेदना की प्रचंड वायु को सहता

हितेश कुमार शर्मा

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/08/2015
  2. nitesh banafer nitesh singh 06/09/2015
  3. Hitesh Kumar Sharma Hitesh Kumar Sharma 07/09/2015

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