ओ ! दुर्योधन / कविता

ओ ! दुर्योधन
सुन सुन सुन
कह दो अपने पक्ष को ।
दे दो फिर आज्ञा
द्रौणाचार्य को
रच लो फिर से चक्रव्यूह
लेकिन अबके चक्र में
कुछ और चक्र डालना
पिछले तूफानों में
नए तूफान पालना ।
कर के ज़िद शकुनि से
फिर रच लेना चाहे प्रपंच
फिर सजा लेना समर-मंच ।
घात लगाओ
बात बनाओ
अबके लेकिन आऊंगा
अकेला एकदम अकेला
ना मेरे पितृ होंगे
न कोई सेना होगी ।
पहले की ही तरह
भयभीत नहीं मैं
करूँगा आह्वान तेरा
फिर मैं ।
क्योंकि –
अबके ना माँ सोई
ना पिता पार्थ ने सोने दिया
न मैं सोया हूँ ।
शक्ति बीजों को
मन-मस्तिष्क में
दृढ़ता से बोया हूँ ।
बीज अंकुरित होंगे
नई सृष्टि के ।
अब टूटेंगे व्यूह सारे
सब जायेंगे कौरव मारे ।
अजेय रहेगा अभिमन्यु ।
विजय रहेगा अभिमन्यु ।।

# महेश कुमार कुलदीप ‘माही’

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/08/2015
    • mkkuldeep mkkuldeep 27/08/2015
  2. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 27/08/2015
    • mkkuldeep mkkuldeep 27/08/2015

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