चंचल मन

चंचल मन हर पल भागे
लेकर कैसे कैसे धागे
उलझे भी कभी सुलझे भी
हर पल बस मांगे ही मांगे

क्या मनकी पायस कभी बुझेगी
मन की चाह क्या कभी रुकेगी
रूह की प्यास बुझाने को
मन बुद्धि से काम लिया
मगर यह न जाना हमने
भक्ति ने जो काम किया

क्योँ कैसे में मन को उलझाया
नीति का भी पाठ पढ़ाया
किताबों में ज्ञान भी पाया
मगर उसको नहीं बुलाया
न चरणों में ही शीश झुकाया
जिस शक्ति के इक अंश हैं हम
ऊस रूह से न रूह को मिलवाया
यहाँ आने का न फ़र्ज़ निभाया
और आ कर यहाँ क्या कमाया

ठहरना मन का बेहतर है
पाने से खो जाना बेहतर है
रोक लगे जो चंचल मन पर
ठहर जाना उसका बेहतर है
चंचल मन तो है ही बांवरा
उसको समझाना बेहतर है

5 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/08/2015
  2. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 26/08/2015
    • kiran kapur gulati Kiran Kapur Gulati 27/08/2015
  3. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 27/08/2015
  4. kiran kapur gulati Kiran Kapur Gulati 27/08/2015