जीवन ज्योति

जब आसमाँ बरसता है
दिल झुम उठता है
जैसे मानों सब धुल गयी हो
हवा जब बहती
तब खो सा जाता हूँ
मानों मैं इस दुनिया में ही नहीं हूँ
दुनिया के इस भीर भाड़ में
जैसे मेरा दिल कुचल गया हो
कभी कभी मन मेरा दूर चला जाता है
किसी हरियाली की और…….
मन चाहे वापस कभी न आंऊ
नयेपन की नलाश में दिल
सदा व्यस्त रहता है
आविष्कार का महक
खुद को भा जाता है
सुनापन से डर लगता है
तो वही सुनापन कभी अच्छा भी लगता है
बल्कि तरसते है…..
सुरमयी संगीत में
डूब जाते है हम
जिंदगी के मिठास को
महसूस करते है हम
हूं तो मैं अभी कली
कभी तो खिलेंगे हम
अभी मुरझाया हुवा हूँ
पर बारिस तो आयेगी
जिंदगी में रोशनी तो आयेगी जरूर
हौसले है बुलन्द
पर न जाने क्यों कभी
अंधेरा भी मुझको भाता है
क्योंकि मैं खूश हूँ अपने आप में
इस वक्त
हर नजारे मुझे रंगीन लग रहा है
ऐसा लग रहा है
सबेरा होने को
ज्यादा देर नहीं….!!!

Leave a Reply