सिसकी अंदर की

किस भंवड़ में फस गया मैं
पीसता रहता हूँ दिन व दिन
जमीर जब छोट खाती है
उस दर्द को मैं कैसे बयाँ करूँ
पीछे ही पड़े है क्यूँ वे लोग मेरे
मुझे तो सादगीपन अच्छा लगता था
यू किसी दलदल में घूसना न चाहता था
मुझ में कोई खराबी है या अच्छाईया
जो हर कोई लोग मुझे ही पुकारे
दुनिया की रीत को शायद मुझे
राज न आया
या दुनियादारी मुझे से संभालि नही जाती
ख्वाबों की दुनिया को
हकीकत में तो बदल नहीं सकता
असली दुनिया के साथ
समझोता भी नही कर सकता
बगावत किया तो मारा गया
स्वीकार किया तो जमीर बेची
मैं बेकसुर
अब क्या करू?
जैसे मैं कैद हूँ
किसी हवालात में
अपने आप को
समेटे रहता हूँ
खुद की पुकार को
अनसुना भी नही कर सकता
मर्जी किसी की मान भी नही सकता
रोज रोज कि ये तु तु मैं मैं
सहन भी नही कर सकता
न कोई उपाय न कोई सहारा
अपने आप को कभी कभी
न्योछावर भी करता
दबी हूई सासों से
खोया खोया मन से
मारती हुई दिल से
सब कुछ निगल जाता हूँ मैं….!

Leave a Reply