धुँधली मंजिल

तन्हाई मुझे डसने लगा था
अकेलेपन में कभी
न जाने मुझे क्या क्या खयाल आते थे
ऐसा कोई दोस्ताना भी न था
जिससे मेरा हाल ए दिल बता सकु
एक जो प्यारी माँ थी मेरी
न जाने कहाँ चली गयी
शायद इतनी दूर चली गयी
कि लौटके आना ना मूमकिन था
शहर थी मेरी
पर मैं था बेजान
मानो मेरा शहर ही अंजान
लोग मुझे जानते थे
पर मैं किसी को नहीं
अपने ही राहो पे
अपने ही खयालातों में
चलता रहता था मैं
जब थम जाता था
अंधेरा ही देखता था मैं
आगे क्या है
मुझे दिखता नही था
पर उस अंधेरे में भी
तन्हाई में भी
एक बात थी
सपने देखा करता था
जो कि मुझे अच्छा लगा था
गुनगुनाता भी था
गाता भी था
पर…….
सपने देखने से…
गाने, गुनगुनाने से…
गरीबी हटती नही
मालूम मुझे भी था
इसलिए कभी
तन्हाई तोड़ के
अंधेरे को छीड़ फार के
बाहर भी निकला था
लेकिन कदम कहां पड़ा था
मुझे पता न था….!

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