मकसद

कड़वाहट के इतने घूट पीए है मैंने
कि कुछ भी कड़वी न लगे है मुझे
बदले में कुछ न मांगा जिंदगी से
सिर्फ एक गुजारिश थी
बल्कि फरियाद
उस मुकाम तक जा पाऊ मैं
जहाँ मेरी मंजिल है
जाते जाते एक सौगात ले जाऊ मैं
थोड़ी हँसी की थोड़ी खुशी की
चाहे आँखरी सांस में ही क्यूँ न हो
प्रसन्नता मेरी मन को छू जाए
हूँ तो मैं अधूरा
न हूंगा कभी पुरा
खामियाँ तो है बहुत
पर कुछ न कर पाऊ मैं
हरदम रहता है कोई तलाश
हासिल कुछ हो न हो
इस प्यासे की प्यास कभी बुझता ही नही
कौन से घरे का पानी पीऊं मैं
यह प्यास है अंदर की
आसानी से न बूझेगी
जब तक तलाश पुरी न हो
कहते है
हर जीवन की एक सरहद होती है
पर मैं ये सरहद भी पार करना चाहता हूँ
अपने आप को बाँध न पाऊँ मैं
जिंदगी से मैं रूसवा भी नहीं न खफा
स्वीकारा जो भी आया
पर बुलावा आने से पहले
देखना चाहता हूँ वो रंगीन नजारा
जैसे महसूस कर सकु मैं
कि आज हुआ मैं पुरा
रहेगी न कोई शिकायत
आँख मुंद लुंगा मैं
जाने से पहले कुछ छाप
छोड़ जाँऊ मैं….!

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