दुशवार

नफरत की आँधी
क्यूँ बह रही है
तुम्हारी दिल में?
इतनी नाराजगी अच्छी नहीं
सीने में आग
लगाया जो मैंने
क्या यह उसी का असर हैं?
कितना समझाउ मैं अब तुमको
दिलासा तो मेरा सुनोगी नही
बल्कि मुझे देखने से ही तुम आजकल
उबल सी जाती हो
कसुरवार तो हूँ मैं
भुगतना तो है मुझे
पर ओ मेरे हमदम
वापस तो आओ तुम लौतके
उसी मोर पर
जिस मोर पे मैं तुम्हें मिला था
जिस हालत में मैं तुम्हें चाहा था
हा…चाहता तो हूँ मैं तुमको अब भी बहोत
पर वो रौनक कहाँ चली गयी?
तुम्हारी चेहरे से?
मुश्किल तो बहोत है
अपने आप को संभाल पाना
नामुमकिन तो नहीं
पर मैं महसूस करता हूँ
हजार कोशिशों के बावजूद
तुम लौत न पाती
ऐसा जख्म तो कभी
भरनेवाला ही नही
मैं भी कितना स्वार्थी हूँ
जिस जख्म का न मरहम न दवा
तो उससे मैं क्या अपेक्षा कर सकता हूँ?
क्या ये आँधी थमेगी?
क्या ये नफरत घतेगा?
भरेगा ये घाव?
मुझे नहीं लगता की वो
लौतके आ पाएगी……!

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