कुण्डलिया-1

तुम भी कर लो जिंदगी, अपने सारे वार |

मेरी भी ज़िद है यही, नहीं पऊँगा हार ||

नहीं पऊँगा हार, कर्म ही मेरा गहना |

मंज़िल मेरा लक्ष्य, चलते है मुझे रहना ||

कह माही कविराय, मुझे कभी थकना नहीं |

पहाड़ दरिया भले, मुझे कभी झुकना नहीं ||

# महेश कुमार कुलदीप ‘माही’

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