पेंचकश

मैं जो चाहू
हो न पाए
मैं जो मांगु
मिल न पाए

बंदीशे है बहुत
भेद न सकु मैं
उपर से ही
तैरता रहता हूँ मैं

रंजो गम ऐसा
कि बता न सकु किसी को
शायद इसलिए मैं
पहेली लगु सब को

उमर बीती जा रही है
वक्त भी है अपने रफ्तार में
होसले भी टूट रहे है
कुछ न कर पाने के गम में

बेकरार रहता हूं मैं
करने को है कितना काम
मुहलत मिलता भी है तो
हो जाता है कुछ अनचाहा अंजाम

टपकती है बुंदे अपनी नैनों से
क्यूँ हूँ मैं इतना नाकाबिले तारिफ
कुछ कर गुजरने का जो मन है मेरा
शायद वही है मेरे मुखालिफ

मैं बेकदर कुछ कदर न जाना जिंदगी का
दिल के सारे दरवाजे भी बंद हो गए
न कोई आहत न कोई दस्तक
अब पश्ताने से क्या फायदा
कोहरे से भरी हुई ये जिंदगी
किसको सुनाए अपनी दास्तां
एक ही थी आरजू अभी
एक ही दिली तमन्ना मेरी
स्वीकार करो मेरी ये पेंचकश
तुम्हारी चमन में फिर से पनाह दो हमें
यूँ ही पल में बैगाना न कर दो हमें
अब तो यही गुजारिश मेरी
यही ख्वाहिश मेरी……

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  1. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 24/08/2015

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