दुश्मन है ये जमाना

तेरी हर आरजु को पुरी करू
थी ये मेरी तमन्ना,
बीच में आई ये कैसी रूकावट
दुश्मन है ये जमाना ।

दुनियाँ में है लाखों हसीनों
तेरी सूरत ही मुझे भाये,
एक इट्टी सी मुस्कुराहट तेरी
मुझे तुझ पे ही मर मिटाये ।

दिल की धड़कने तेज है क्यूँ इतना
सोच के हूँ मैं हैरान,
साथ में तु तो ख्वाबों में भी तू
रह गया डंग और हूँ परेशान ।

तरसता हूँ मैं दिन व दिन
एक झलक पाने को तेरी,
महक उठा मेरी जिंदगी ऐसी
जब तूने इस बंदे को सवारी ।

तेरी हर मिठास को पी जाँऊ मैं
थी ये मेरी तमन्ना,
बीच में आई ये कैसी करवाहट
दुश्मन है ये जमाना ।

तू भी था बेखबर….
मैं भी था मदमस्त….
बसे थे हम कहीं जैसे
अलग ही दुनियाँ में,

तेरे हर सपने….
मेरे हर आरमां….
बनाये थे एक ख्वाबों का गुलिस्ताँ
वक्त न लगे टूटके बिखड़ने में ।

नजर लग गयी किसकी आखिर
टूट गयी आशियाना,
न खिला फूल न खिला संसार
अब जैसे लगता है वीराना ।

तुझको मैं अब पुकारू भी कैसे
हो जाता है तू अनसुना,
बीच में आई ये कैसी वगावत
दुश्मन है ये जमाना ।

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