अर्धरात्रि की सुंदरता और मेरी दोस्ती …..

रातों में चांदनी की दूधिया रोशनी इक
अनोखी खूबसूरती को लब्ज़ें बयान कर रही थी…
हवाओं की सनसनाहट सन्नाटें को
चीरती हुई इक प्यारी-सी धुन गुनगुना रही थी …..
प्रकृति की अर्धरात्री सुंदरता सबको मोहक
करने वाली अदा प्रस्तुत कर रही थी …..
मैं भी खिड़की के पास बैठे
इस अनोखी छँटा का लुफ्त उठा रहा था…..
ऐसा लगता था नींद ने तो मुझसे नाता ही तोड़ दिया हो….
लगता था मैंने कोई बड़ा गुनाह किया हो……
धड़कन और सांसे तो चल रही थी पर लगता था
मेरी ज़िन्दगी कही इक मोड़ पर रुक सी गयी हो……
उसकी यादों का धुँआ मेरे इस जीवन में
मानो चारों तरफ धुंध फैला रहा था …..
उसकी उस यादों के एहसास को मिटाना चाहता था…..
उस मोड़ से ज़िन्दगी को आगे बढ़ाना चाहता था ….
तभी इस प्यारी रात से अपनी दोस्ती बढ़ा रहा था ….
इस प्रकृति की दोस्ती से उसकी यादों को मिटा रहा था …
बेज़ुबान है ये प्रकृति पर फिर भी बिन बोले
हमें सुकून दे देती है …
इंसान तो जुबान से ही न जाने कितने गहरे जख्म दे जाता है…
मेरी भी कुछ ऐसी ही कहानी थी …..
पर इस अनमोल प्रकृति ने मेरा हाथ थामा था…
अब तो नींद भी बिन बुलाये दस्तक दे जाता
जब मैं इस प्रकृति की सुंदरता में खो जाता …
शब्द भी कम है और अलफ़ाज़ भी……
प्रकृति है इक गहरी और अनोखी दोस्ती की मिसाल भी …

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  1. Gurpreet Singh 19/12/2015

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