सपना मेरा साकार हुआ

मैं एक सपना देख रहां हूं
सपना साकार होते देख रहां हूं
मंजिलें हम से दूर नहीं
फिलहाल अभी तो हम मशहूर नहीं

राही बन के चल रहा हूं
कोई हमसफर रहे न रहे,
गिले शिकवे रहेगा न कुछ
अगर हम खरे उतरते रहे

वक्त की पावंड नहीं हूं मैं
बेवक्त भी कु्छ कर जाता हूं मैं
हसे जो हम पे ये जग सारा
इसीलिए तो फिरता रहता हूं मारा मारा

दर बदर भटकता रहता हूं मैं
परेशानीयों को पाले रहता हूं मैं
साथ नहीं मिलता कोई किसी का
भाया नही मुझे कोई जीने का तरीका

जग ने हमको बहुत लूता
मैं किसी को लूत न पाता
लूत न पाने का कोई सवाल ही नहीं
ऐसा तो बंदा मैं हूं हीं नहीं

मंजर तो बहोत देखे है मैंने
उनमें भी कितने तराने
मदमस्त दिल को लगते है लूभाने
नये बन जाते है पूराने

उम्मीदों के धागों से बंधता रहता हूं मैं
के शायद कोई आये
फिजुल ही वक्त जाया करता हूं मैं
सपनों की लहरों में लहराए

अरे! ये मैं कहां आ गया?
तो मैं कहां था?
हां…..सपना ही तो देख रहा था…
पर ये क्या……..??

ये तो सपना नहीं…
बल्कि हकीकत है…
मंजिल को चूमे खड़ा हूं मैं
सपना मेरा साकार हुआ……….!!!

Leave a Reply