जिंदगी में कोई न होता किसी का

जिंदगी में कोई न होता किसी का
आज मैं ये जाना
किसी का कितना ही
पेड़ों तले गिर न परू क्यूँ मैं
मैं किसी को राज न आता
सच में
जिंदगी में कोई न होता किसी का

प्यार का मोहताज था मैं
पर वो थी मायूस गुमचुम
मनमुटाव बढ़ने लगा था
दरारे बढ़ती गयी थी
पश्चात्ताप से भरा था मेरा मन
पर मैं कुछ न कर पाता
शकल से ही नफरत करती है वो मुझे
मैं तो जीते जी मकबरा बन गया

घड़ियाँ जैसे लंबी होती जा रही है
आँखें तो नम हैं
दोनो की…
पर ये सितम और सही नही जाती
शाम ढले
फरियाद थी एक विभावरी की
पर बिजुरी आई ऐसी
जैसे दोनों ही दफन हो गए
किसी कफन में

अब तो इर्द गिर्द कोई न था
दिल तो चिख चिख के कहना चाहता था
बहुत कुछ
पर सुनेगा कौन?
कौन किस की चोखट पे
खटखटाये अब?
तजुर्बा यहीं रहा
की
जिंदगी में कोई न होता किसी का…..!

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