अलविदा

रास्ते पे चला जा रहा था
खयालातों में डूबा हुआ था
हैरत हूँ मैं खुद को लेकर
परेशाँ जैसे रहता अक्सर
अडचने कभी भी हटती ही नहीं
जज़्बात किसी को बता सकता भी नहीं
जमाना नहीं रहा शराफत की
रहा तो रहा सिर्फ खुशामद की
हकीकत में तबदिल नहीं होती है तमन्ना
काटों भरी राह पर और कितना झुलसना?
मंजिलें आँखों से हो रही है ओझल
खोखलेपन की एहसास हो रही है हर पल
इजहार न कर सका अपनी असलियत
करता भी तो, क्या मिलती अहमियत?
धरती पर अपने आप को बोझ लागे है मुझे
रह गया क्या वजुद अपनी…कुछ भी न सूझे
भरोसा नहीं रहा जमाने पे
अब पुरा कर दो विदाई की रस्में
रहा नहीं अब कुछ भी हसरत
होना चाहुँगा जल्द ही रूखसत
रफ्तार अपनी थमती जा रही है
जिंदगी बदतर बनती जा रही है
नही लगता अपने आप को महफूज
दस्तक अंदर से मिलता है हर रोज
सिमटना चाहूँ मैं मातम की गौद में
जी लिया बहुत खुदा कि रहमो करम पे
दुनिया से मैं हो जाऊँगा गुमनाम
जब आयेगा उपरवाले का पैंग़ाम
जाने क्या मिलेगा मुझे उस दुनिया पे?
जो न मिला मुझे इस दुनिया से
अलविदा न मैं कह पा रहा हूँ
आकासकुसुम न मैं छोड़ पा रहा हूँ
मैं मुसाफिर सफर खतम कर रहा हूँ
जनाजा अपना तैयार कर रहा हूँ
आखिर में सफल किया इरादा
दुनिया से मैं हुआ अलविदा………..!!

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