नहीं कुछ ज़्यादा बस में हमारे

नहीं कुछ ज़्यादा बस में हमारे

सोचा था जब
कर लेंगे सब
कुछ हुआ न तब
सोचते है अब
कैसे होगा सब
तो याद आता है रब
थे घिरे मुश्किलों में
तब हुआ कुछ ऐसा
न उम्मीद जैसा
गिर गया पलों में
था जो पहाड़ जैसा
देखते रह गए हम
यह जादू था कैसा
सोचा बहुत
तब हमने जाना
नहीं कुछ ज़्यादा
बस में हमारे
चाहे जो वोःतो
पत्थरों को हिला दे
चाहे अगर तो
प्रलय भी ला दे
परे है बहुत
वोः हमारी समझ से
मगर दिखता है हर पल
करिश्मे अजब से
बदल देता है राहें
मंज़िलों के ठिकाने
जब खो जाते हैं रासते
बना देता है बहाने

जो नहीं बस में हमारे
सब कर दिखता है वोः
शरण में जो भी आ जाये
दुःख सारे भूलता है वोः
प्यार से पुकारो तो
श्याम बन आता है वोः

भ्रम ही है
जिसमें जीते हैं हम
करना चाहतें हैं जो
क्या कर सकते हैं हम
नहीं है कुछ भी कहीं
बस में हमारे
मर्ज़ी है उसकी
हम हैं उसके सहारे
चाहे जो वोः
तो दुनिआ बना दे
न चाहे तो
नामो निशाँ भी मिटा दे
है दुनिआ उसी की
अब वोःही संभाले

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