राम वनगमन

राम वनगमन

अयोध्या के राजा दशरथ का निर्णय
सरयू नदी किनारे अयोध्या
अयोध्या का राजा दशरथ ज्ञानी और सत्य-पराक्रमी
दशरथ की रानियाँ तीन और राजकुमार चार
था उसका खुशियों से भरा संसार
दशरथ हुए वृद्ध, आया मन में यह विचार
मर्यादावान, सर्वगुण संपन्न, गुणी
नीति निपुण, अस्त्र-शस्त्र में निपुण,
क्षत्रिय धर्म को पालने वाला
रामचन्द्र ही उपयुक्त है सिंहसान का अधिकारी
सबके लिए होगा वह सुखकारी
कौशल्या का बेटा राम था सबसे बड़ा राजकुमार
सब भाई होते उस पर बलिहार
दशरथ ने मंत्रीमंडल की सभा में रखा यह प्रस्ताव
मंत्रीमंडल ने स्वीकार किया प्रस्ताव
सुमंत्र संदेशा ले कर गया राम के पास
राम शीघ्र ही वहाँ आया राजा के पास
दशरथ के वचन सुनकर राम को हुआ हर्ष अपार
राम ने मित्रों को सुनाया समाचार
दशरथ ने नगर मे घोषणा की ऐसे
राम का अभिषेक होगा कल सुबह हो उत्सव जैसे
राम सखा सब आनंद मनाते
नगरवासी सब मंगल गान गाते
नगरजन यत्र तत्र, यहाँ वहाँ, नगर सजाते
इधर-उधर, जहाँ-तहाँ, मोद मनाते, गीत गाते
हो गया जैसे त्यौहार, तोरण लगाते, ढोल बजाते,
सबकी ज़ुबान पर एक ही बात
सब का प्यारा, साँवला राम का होगा राज
माताओं मे छाया उल्लास
महलों में छाया हर्षोल्लास
कैकेयी के वरों की मांग
मैके से आई कैकेयी की मुखिया दासी
मंथरा को राजा का निर्णय न भाया
उसने कैकेयी को उकसाया
बोली राजा दशरथ की है चाल
भरत को क्यों भेजा ननिहाल
राम का राज होगा कौशल्या करेगी राज
और वह पाएगी एक दासी जैसा व्यवहार
उसे अपमानित दासी का जीवन जीना होगा
मालूम नहीं भरत का क्या होगा
मंथरा ने कैकेयी को सुझाया
देवासुर संग्राम में पाये दो वरों को याद दिलाया
उनको मांगने का उचित समय है आया
अपने भाग्य को बदलने का सुनहरा अवसर है आया
एक वर से भरत को राजगद्दी
दूसरे वर से राम को चौदह बरस का वनवास
मंथरा की चाल कैकेयी को भा गई
कैकेयी अपना श्रृगांर उतार कोपभवन में बैठ गई
दशरथ का उलझन में होना
राजा दशरथ ने कैकेयी को अपना विचार बताया
कैकेयी ने देवासुर संग्राम को दोहराया
कैकेयी ने दोनो वरों की माँग की
एक से अपने बेटे भरत के लिए राजगद्दी
और दूसरे से राम के लिए चौदह बरस का वनवास
दशरथ को कैकेयी के वचन वाण से लगे
दोनों वरों को सोचकर पछताने लगे
दशरथ बड़े सहम गए हुआ वज्रपात
राजा कैसे भेंजें अपने प्राणप्रिय राम को बनवास
कैकेयी को बड़ा समझाया
पर कैकेयी को कुछ समझ न आया
रघकुल रीत सदा चली आई
प्रान जाए पर वचन न जाई
दशरथ कैकेयी के वचन कैसे मानते
राम का विछोह वह सह नहीं सकते
कुपित, हठी रानी न मानी
जबतक रानी की बात दशरथ ने न मानी
कैकेयी के वचनों ने दशरथ को उलझन में डाल दिया
उनकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया
कल सारी नगरी उत्सव मनाएगी
गली-गली बजेंगे नगाड़े
नगर महल जहाँ-तहाँ होंगे उत्सव
नगरवासी खुशियाँ मनाएँगे
ए कैकेयी तू क्यों बात बिगाड़े
तेरी कुछ ओर माँग है तो बता दे
कैकेयी ने बंद कर लिए कान
सोच रही थी कैसी होगी उसकी शान
क्यों सुने वह किसी की बात
उसका बेटा भरत करेगा राज
दशरथ बेटे राम के बिना चौदह बरस कैसे जी पाएँगे
वह उसका का वियोग सह नहीं पाएँगे
राजा बार-बार मूर्छित होने लगे
मछली की तरह तड़पने लगे
कोपभवन में कोई अंदर न जा रहा था
कोपभवन से कोई बाहर न आ रहा था
कोपभवन की घटना का किसी को पता न चला
कोई न जाने कोपभवन में क्या हुआ
कैकेयी का राम को आदेश सुनाना
सूर्योदय के समय वशिष्ठ पधारे
राजा की हालत देखकर धीरे-धीरे कदम बढ़ाते
राम शीघ्र वहाँ महल में बुलवाया गया
आकर पिता तथा माता को शीश झुकाया
पिता थे क्यों बेहोश कुछ समझ न पाया
कैकेयी ने राजा का नाम लेकर अपना आदेश सुनाया
कैकेयी का मन हर्षाया
अपनी माँग को पूरा करते पाया
राजा ने उसे दो वर थे दिए
आज उन्होंने वे वर पूरे किए
बस इतनी सी है बात
क्यों कर रहे इतना विषाद
एक वर से राजा ने दी भरत को राजगद्दी
दूसरे वर से उसको चौदह बरस वनवास
राम सुनकर घबराए नहीं
उसे राजसिंहासन का कोई लोभ नहीं
उसके प्रिय भाई भरत को मिले राजगद्दी
उससे बड़कर कोई दूसरी अच्छी बात नहीं
दशरथ कहते राम का नाम और कुछ सूझता नहीं
पिता हों दुखी उसे यह स्वीकार नहीं
राम ने खुशी-खुशी वनवास स्वीकार किया
कल प्रातःकाल ही वन जाने का निश्चय किया
राम महल से बाहर आये
राजा अस्वस्थ है सबको यह बताए
कल सुबह उसको वन में जाना है
पिता का वचन निभाना है
बात फैलती गई नगर में अवसाद छा गया
सब पूछने लगे ऐसा क्यों हुआ
नर जो चाहे न मिले वही मिले जो चाहे रचनाकार
नहीं बदल सकता मानव चाहे जितना यत्न करे प्रयास
राम का माता कौशल्या को सूचना देना
राम ने सबसे पहले कौशल्या को सूचना दी
आरती उतारने की मनाही की
पिता की आज्ञा का पालन करना है
उसको कल सुबह चौदह बरस के लिए वन जाना है
आरती की थाली हाथ से छूट गयी
माता कौशल्या शोक में डूब गई
पिता ने दी राजगद्दी भरत को
पर वनवास क्यों उसके साँवले सलोने राम को
कौशल्या भी उसके साथ जाने को तैयार हुई
राम ने पिता की हालत बताई
राम ने माँ को बहुत विश्वास दिलाया
चौदह बरस बीतते ही लौट आएगा ढांढस बंधाया
रामका पत्नी सीता को सूचित करना
जननी से ले विदाई
सीता को बात बताई
पिताने उसे दण्डकारण्य वन का सम्पूर्ण राज दिया है
कल सुबह ही चौदह बरस के लिए प्रस्थान करना है
सीता भौचक्की हो गई
उसे भी साथ जाना है
राम ने कहा उसे पिता की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना है
सीता ने कहा उसे पत्नि धर्म निभाना है।
राम ने सीता को वन का भय दिखाया
वन का जीवन बहुत कठिन है बताया
कौशल्या ने भी सीता को बहुत समझाया
महलों को छोड़कर वन में रहना उचित नहीं समझाया
सीता ने पत्नि का धर्म क्या है उसका अहसास कराया
आखिर सीता का साथ जाना ही उचित पाया
लक्ष्मण का राम के साथ जाने की ज़िद करना
लक्ष्मण भी राम के साथ जाने को तैयार हुआ
उर्मिला को कुछ न बताया
राम ने उसे भी बहुत समझाया
पिता का हाल बताया
नहीं रह सकता वह राम बिना महल में
विधि ने बदल दिया सब का संसार एक झटके में
बिगड़ गया सब खेल रंग में भंग हो गया
छूट गया महल वन ही महल हो गया
जहाँ राम है वहीँ लक्ष्मण है
कल सुबह ही राम के साथ वन में जाना है

राम का वनगमन
तीनों सूर्योदय से पहले
कैकेयी और पिता से वन जाने की आज्ञा मांगने आए
साथ में सीता और लक्ष्मण भी आए
तीनो को चौदह बरस वन में
वल्कल वस्त्र पहनने की आज्ञा दी
राजा दशरथ अभीतक बेहोश पड़े थे
बार-बार कराह रहे थे
राम ने सबको प्रणाम किया
गुरुओं की वंदना की
बात फैलती गई
नगर में अवसाद छा गया
ढोल नगाड़े बंद हो गए
सब एक दूसरे से पूछने लगे ऐसा कैसे हुआ ,क्यों हुआ
कोई न बता सका यह कब, कैसे हुआ , क्यों हुआ
माता कैकेयी की आज्ञा
और पिता का मौन सम्मति समझ कर
तीनों ने साथ-साथ वन की ओर प्रस्थान किया
राम के वनगमन से सब की आँखे छलछलाने लगी
दशरथ ने आँखें खोलीं सुमंत्र को बताया
तीन-चार दिन घुमाकर वापिस ले आना
नगरवासी इकट्ठे हो गए
राम के वनगमन से निराश हुए
वन चले रघुराई
अयोध्या में उदासी छाई
नगरवसी एक दूसरे से पूछने लगे
राम वनगमन का कारण पूछने लगे
कैसी है माता जो बेटे को वन में भेज दिया
सीता और लक्ष्मण को भी क्यों भेज दिया
नगरवासियों को छोड़,
अयोध्या को सिर नवाकर
अयोध्या का त्याग कर तीनों आगे बढ़ चले
राम ने न मुड़कर देखा
महल से बाहर आए रथ में बैठ गए
अयोध्यावसी पीछे चलते रहे
रथ चलता रहा, लोग नंगे पैर दौड़ते रहे
यह सोचते कि वे चौदह बरस उनके दर्शन न कर पाँएगे
वे इतने बरस उनके बिना कैसे जी पाएँगे
विचलित राम की आँखों में आँसू भर आए
लोग खड़े रहे जबतक राम ओझल न हुए
लोग कहते राम लौट आओ
राम लोगों को कहते लौट जाओ
लोग लौटने के लिए तैयार नहीं
राम लौटने के लिए तैयार नहीं
जहाँ-जहाँ रथ जाता
लोग दौड़-दौड़ कर राम के दर्शन करने आने लगे
राम मत जाओ हमें छो़ड़कर मत जाओ गिड़गिड़ाने लगे
लोग रोते और कहते राम मत जाओ

तमसा के तट पर
राम ने सबसे पहले तमसा नदी के तट पर
घासफूस की सथरी पर पहली रात बिताई
नगर निवासयों को सोया छोड़ राम आगे बढ़ गए
निषाद ने अपनी नाव से दूसरे किनारे पहुँचाया
श्रृगंवेरपुर गंगा के तट पर पहुँचाया
गंगा को नाव से पार किया
जटाओं का मुकुट बनाया
भरद्वाज मुनि के आश्रम के पास पहुँचाया
अत्रि ऋषि के आश्रम में उसकी पत्नि अनुसूईया से मिलाया

राम चित्रकूट में
यमुना को पार कर चित्रकूट पहुँचे
चित्रकूट में कुटिया बनाकर आसन जमाया
चित्रकूट दण्डकारण्य में दस साल का समय बिताया
मुनि वाल्मीकि मिलने आए
राम को उपदेश सुनाए
कई ऋषि मुनि दर्शन करने आने लगे
राम ऋषि-मुनियों से शिक्षा ग्रहण करने लगे
जैसे प्यासी गौ भागती है पानी के लिए
शाम को भागती है अपने बछड़े को मिलने के लिए
वैसे लोग भी दिन प्रतिदिन चित्रकूट में आने लगे
राम का दर्शन कर अपनी प्यास बुझाने लगे

दशरथ का स्वर्ग सिधारना
कर्म की गति अति कठिन है
जिसने जन्म लिया है
उसका मरना भी अवश्य है
अयोध्या सूनी हो गई
दशरथ को श्रवण के माता-पिता का श्राप याद आया
सुमंत राम को छोड़कर अकेला लौट आया
क्षत-विक्षत, घायल राजा दशरथ रो पड़े
करने लगे विलाप और स्वर्ग सिधार गए
राम का वनगमन दशरथ की मृत्यु का कारण हुआ
तीनों रानियां विधवा हो गईं
सारे राज्य में शोक छा गया
सारी प्रजा उदास हो गई
अयोध्या सूनी हो गई
भरत का ननिहाल से लौटना
दूत भरत और शत्रुघ्न को वापिस लाया
शोभाहीन अयोध्या में सन्नाटा था छाया
भरत नगरवासियों का आर्तनाद सुन न पाया
पिता की मृत्यु सुनकर बड़ा व्याकुल हुआ
माता कैकेयी पर अति क्रोध आया
भैया राम का वनगमन न सुहाया
उसे माता का दिलवाया पद न भाया
अपनी माता को कठोर वचन सुनाये
पिता का दाह-संसकार कर सब कर्तव्य निभाए
माताओं, गुरूओ तथा अयोध्यावासियों ने साथ दिया
राम को वापिस लाने का निर्णय किया

भरत चित्रकूट की ओर
राम को लौटाने चित्रकूट की ओर कूच किया
राम ने भरत का आलिंगन किया
भैय्या राम को बहुत मनाया
पिता हैं स्वर्ग सिधारे अयोध्या सूनी हो रही
माता ने जो पद दिलाया है वह उससे प्रसन्न नहीं
कैकेयी भाईयों का प्रेम देखकर अति लज्जित हुई
विघ्न डालने के लिए क्षमा माँगने लगी
पिता की आज्ञा का पालन करना अनिवार्य है
अब राम का लौटना नमुमकिन है
राम और भरत अपनी बात पर अड़िग रहे
भरत का प्रेमभक्तिभाव देखकर राम पिघल गए
राम ने अपनी पादुकाएँ दी
भरत ने पादुकाएँ अपने सिर पर धारण की
सीय अनुज से आज्ञा पाई
ले चले पादुका सिर धराई
भरत का राम बिना लौटना
भरत राम बिना अयोध्या लौट आए
महल त्याग वल्कल वस्त्र धारण किए
नन्दिग्राम में एक कुटिया बनाई
सिर पर बालों की जटा बनाई
वहाँ कुशा बिछाकर आसन जमाया
कंदमूल को अपना आहार बनाया
पादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित किया
राम के नाम से राज किया

राम पंचवटी में
दस साल का समय दण्डकारण्य में व्यतीत हुआ
कितने मौसम आये जीवन बीत गया
दशरथनंदन, कौशल्यानंदन, सीतापति राम
चित्रकूट छोड़ पंचवटी की ओर बढ़ चले
पंचवटी में अपनी कुटिया बनाई
शूर्पणखा ने लक्ष्मण से नाक कटवाई
वहाँ रावण ने सीता का हरण किया
कितने राक्षसों का मरण हुआ
हनुमान ने लंका जलाई
राम ने रावण पर विजय पाई
रावण के भाई विभीषण ने राजगद्दी पाई
सीता को रामने स्वीकार किया
चौदह बरस का वनवास समाप्त हुआ
रामका वन से प्रत्यागमन
चौदह बरस का वनवास समाप्त हुआ
राम, सीत और लक्ष्मण का अयोध्या में आगमन हुआ
सब ने उनका अभिनंदन किया
रामराज्य स्थापित हुआ।
अयोध्या में फिरसे उत्सव आरम्भ हुआ ।
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