जब भी देखूँ सोचूँ मन में

जल में थल में हो यां नभ में
हर जगह हर पल पल में
तू ही तू हर कण कण में
कला बसी है हर जीवन में

जब भी देखूँ सोचूँ मन में

कितने अध्भुत आकर बनाये
चाहें भी तो गिन न पाएं
कैसे कैसे रंग सजाये
देखें तो हम दांग रह जाएँ

तेरी तो हर बात निराली
सबके मन को मोहने वाली
फिर भी जीवन एक पहेली
सुलझी कभी न सुलझनेवाली

जब भी देखूँ सोचूँ मन में

लीला तेरी कैसी प्यारी
सलोनी अध्भुत और अति न्यारी
जिसपे जाती दुनिआ वारी
कभी सुध हमारी भी लेलो मुरारी
लागे अपनी फिर दुनिया ये सारी

न फिर सोचूँ और न ही विचारूँ
पल २ क्षण २ देखूँ तुझको
और हर पल तेरी राह निहारूँ

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