सोन चिरैया बन आई इस आँगन

सोन चिरैया बन आई इस आँगन…
खुशियों के तिनकों से बना ये नया आँगन…
सुना घोसला गुलजार हुआ …
किलकारी भी गूंजी इस आँगन ….
सुनी गोद थी तेरी मईया …
उसे आ भर दी प्यारी सी सोन चिरैया …
बन गयी वो पापा की राज-दुलारी …
चिरैया ने उन्हें बाबा कह पुकारी ….
खेलने-कूदने के उसके दिन बीते …
धीरे -धीरे चिरैया कब हो गयी सयानी…
ये बात सोन चिरैया भी नहीं जानी …..
जब आई चिरैया की दूसरे अंगने जाने की बात …
फिर सोन -चिरैया हुयी बड़ी आहात …
तू रे चिरैया है परायी-धन …
दूसरे अंगने में भेजने का नहीं है हमारा भी मन ….
पर है ही ये संसार की रीति …
जो एक दिन हर चिरैया को है निभानी पड़ती …
अब तक था ये ही आँगन तेरा रैन -बसेरा ….
कुछ अलग लिखेगा तेरी किस्मत में ये नया सबेरा …
किसी और के आँगन में होगा तेरा गुजर …
ये सब सुन सोन चिरैया हुई उदास और लाचार ….
ओ रे विधाता! आखिर कैसा है ये नियम और कैसा ये संसार ?
क्यों नहीं हैं हम पूरी ज़िन्दगी इसी अंगने के हक़दार?
सोन चिरैया बन आई इस आँगन …
आज पराये होने की नयी पंख
लगा दी गयी मेरी इसी आँगन ….
सोन चिरैया बन आई इस आँगन …..

अंकिता आशू

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