शरारतें

तुम क्यूं न
अति दूर चली जाओ

तुम्हें क्यू न
एक बेहतर साथी मिले
मुझसे ।

तुम्हे क्यूं न
बहुत प्यार मिले।

तुम्हे क्यूं न
वो खुशियों का संसार मिले
जहां से आदमी भुल जाता है
अपना सब अतीत
एक सुनहले वर्तमान को पाकर ।

फिर भी तुम कैसे भुलोगी
छत पे कपड़े सुखाते वक्त
स्वयं के साथ का अल्हड़पन
और आॅखों ही आॅखों में होने वाला
प्रेम की अनमोल शरारतें।

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