ख़ाली हाथ ही जाना है

जो ज़िन्दगी ने दिखाया
हमने खुद को बताया
चाहा कभी रोक लें पलों को
कभी उनसे पीछा भी छुड़ाया
सुख दुःख तो हैं सायों की तरह
निभाते हैं साथ अपनों की तरह
हो सकती है जुदा कहानी तेरी मेरी
कभी उजला सवेरा कभी रात अँधेरी
हम उलझें हैं भूल भूलभुलयों में
अब ज़ोर नहीं कलाइयों में
शाम ज़िन्दगी की होने को है
वादे इरादे सब खोने को हैं
बुन लिए बड़े जाल सुनहरे
देते रहे सदा उनपे पहरे
अब छोड़ यहीं सब जाना है
ख़ाली हाथ आये थे
ख़ाली हाथ ही जाना है
गुज़रे वक़्त को छोड़ दिया
उमीदों से नाता तोड़ लिया
अब क्या पाना है
क्या खोना है
ख़ाली हाथ आये थे
ख़ाली हाथ ही जाना है

2 Comments

  1. Kishore Kumar Das Kishore Kumar Das 18/08/2015
  2. kiran kapur gulati Kiran Kapur Gulati 19/08/2015

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