आहटें / कविता

निःशब्द

निस्तब्ध

निरूप

आहटें !

समय की घंटी

प्रति प्रात:

करती -टन टन टन

कनकटे अक्षविहीन

क्या सचमुच बहरे !

अंतर विमुख

कोलाहल रच

प्रहसन होते

तार उलझाये

प्रच्छन्न विकलता

तभी न सुनते

तभी न खुलते

पट श्रवण के

समय अश्व

लगाम बेलगाम

कर मुट्ठी में

हाँक रहा जो

चरम उसी का

परम उसी का

क्योंकि –

अव्यक्त

सशक्त

तुरुप

आहटें !!

रचनाकार :- महेश कुमार कुलदीप ‘माही’

2 Comments

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari"Indwar" 18/08/2015
  2. mkkuldeep mahesh kumar kuldeep 19/08/2015

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