हर पल घाट रही है

बाँटने को ख़ुशी ,
मिल जायेंगे बहुत ,
बाँटने को गम,
दिल में दर्द चाहिए
यूं तो धड़कता है,
हर सीने में वोः.
पहचाने उसे जो
ऐसा इक जिगर चाहिए
अपनों को देखा ,
परायों को देखा,
छोड़ जाते हुए ,
हम्सयों को देखा
लगता था मुमकिन ,
हददों में बंध
गया वोः
न मुमकिन था जो
पलों में घट
गया वोः
चाहता नहीं गम कोई ,
ख़ुशी सदा रहती नहीं
खोना याँ पाना
ही ज़िन्दगी है
मुड़के देखा कभी
तो लगा
घटना है कोई
जो हर पल घट रही है
बहारें सदा रहती नहीं,
बदल जाते हैं मौसम
घटाओं का भी
कुछ पता नहीं है.

Leave a Reply