यूँ जिंदगी से ऊब के जाऊं तो मैं कहाँ (ग़ज़ल)

यूँ जिंदगी से रूठ के जाऊं तो मैं कहाँ
हैं जख़्म जो सीने में छुपाऊँ तो मैं कहाँ !

हो दर कोई खाली तो बता दे ए रक़ीब
ये ज़ख्म-ए-ला-ईलाज दिखाऊं तो मैं कहाँ !

हर दर-ओ-दरगाह पे लाखों है अर्जियां
ये रंज जिंदगी के सुनाऊं तो मैं कहाँ !

अब बंद बोतलों में पानी है बिक रही
हैं आग जो सीने में बुझाऊं तो मैं कहाँ !

धरती क्या आसमां क्या हैं चाँद बिक रहा
बिन पंख के सपनों को उड़ाउँ तो मैं कहाँ !

हर शोख़ हैं हाथों में खंज़र लिए खड़ी
नफ़रत के इस शहर में दिल लगाऊँ तो मैं कहाँ !

हर जगह हैं नफ़रत और शरहदों की लकीर
सपनों का आशियाँ अब बनाऊं तो मैं कहाँ !

न कद्र कोई हैं यहाँ रुस्वाई की गम की
”रंजन” बता दो आंसू बहाऊँ तो मैं कहाँ !

प्रभात रंजन (09931424816)
उपडाकघर रामनगर
प० चम्पारण बिहार

5 Comments

  1. ashok jain 16/08/2015
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 16/08/2015
      • प्रभात रंजन प्रभात रंजन 16/09/2015
    • प्रभात रंजन प्रभात रंजन 16/09/2015
    • प्रभात रंजन प्रभात रंजन 12/10/2015

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