जो तुम नहीं, तो हम कहाँ

कुछ कहते हैं लोग नहीं तेरा पता
इक इशारा है तेरा,है सारा जहाँ
जो तुम नहीं,तो हम कहाँ
हर आकर ,हर प्रकार में
रचे हो तुम
सांसो की ,हर साँस में
बसे  हो तुम .
खुली हों या ,बंद पलकें
हर जगह ,
नज़र आते हो तुम
लीला तुम्हारी ,बड़ी है न्यारी
हर पल में तुम ,हर क्षण में तुम
जहाँ जाती है नज़र,
हर रचना में हो तुम ही तुम.
नदियों में,नालों में,
समंदर की ,उछालों में ,
पक्षिओं की,लम्बी कतारों में.
देखती हूँ जब ,मैं ऐसा जहाँ
सोचती हूँ,सब हुआ किस तरह.
ख़ूबसूरत नज़ारे,बड़े प्यारे प्यारे
बोलें वो मुझसे ,कुछ करके इशारे.
दुनिआ का होना,
इक अदा है उस की,
उलझना न इनके ,रंगों में तुम,
है यह बुलबुला कुछ ही पलों का,
मेहमान है यह कुछ ही क्षणों का.
जो है आज कुछ और में,
बदल जाता है कल,
बदल जाते हैं चेहरे ,
चलता रहता है पल
नहीं है ठिकाना,सांसो का यहाँ
फिर तुम जो नहीं,तो हम कहाँ.
भरोसा तेरे होने का,देता है इक आस
इशारा तेरा,भरता है विश्वास
हर जगह हो तुम मिलता है आभास
फिर कैसे कहेँ नहीं हो तुम.
हर पल. में तुम हर क्षण में तुम
तुम में हम,और हम में तुम
जिधर देखती हूँ
तुम ही तुम, तुम ही तुम.

 

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