अनिश्चितता

इस भरी दुनिया में खो सा जाता हूँ
कभी यहाँ कभी वहां डूब सा जाता हूँ
उगते सूरज की लालिमा
को रोज ही देखा करता हूँ
करने को उसे मुट्ठी में कैद
रोज़ ही बेचैन होता हूँ
कभी यहाँ कभी वहां डूब सा जाता हूँ
इस भरी दुनिया में खो सा जाता हूँ

मै कौन हूँ कहा से आया हूँ
क्या बनना था क्या बन पाया हूँ
मुझे जाना था बादलो के उस पार
छूना था आसमान का वह छोर
चमकना था कनक के समान
पर हूँ मै अब तक क्यों अनिश्चित सा
सोच सोच कर थक जाता हूँ
कभी यहाँ कभी वहां डूब सा जाता हूँ
इस भरी दुनिया में खो सा जाता हूँ

सोता हूँ रोज़ सुबह तारो पर चलने को आतुर
जानता हूँ वह छन आएगा मुझ तक मगर
उस छन का प्रतिपल रोमांच को सेता रहता हूँ
इस आस में हरदम जागा रहता हूँ
कभी यहाँ कभी वहां डूब सा जाता हूँ
इस भरी दुनिया में खो सा जाता हूँ
इस भरी दुनिया में खो सा जाता हूँ

कनक श्रीवास्तवा

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