ना-वाकिफ

जब कोई अपने ही लोग
अपने जमीर को
ललकाड़ता है….
जिस की चेहरे में
हसी देखने के लिए
खुद को विलीन कर देना चाहता हूँ….
वही अगर दुतकारे
ये दिल दिल नहीं रहता…
मैं तो उत्तरदायित्व संभालते आया हूँ
क्या कसर रह गयी मुझ में?
हाँ….गलतियां हुई….
बहुत हुई…..
क्या मैं क्षमा का पात्र नहीं?
ऐसी महानता शायद हर किसी की बात नही
करे भी तो क्यों करे माफ?
क्या मैं हूँ इसके काबिल?
पता नहीं……….
लोगों से मैं दर्द बाटना चाहता हूँ
पर अंजाने में जो दर्द मैंने दिया उनको…
कैसे सहे वो!!
मैं तो अभी कुछ भी कर गुजर नहीं सकता…
होनी को अन्होनी नही कर सकता…
पर मेरा दिलासा कुछ न काम आवे…
महान है वो…
मैं क्यों भला उसकी गलतियां निकालु?
मेरे करीब जो है वह..
वही न काफी है मेरे लिए?
पर जिंदगी का शहद कौन पीना नही चाहता?
मीठास घटती जा रही है….
क्रम अनुसार….
एक दिन आयेगा……
जब कुछ न होगा……
न रहेगी शहद, न उसकी मीठास…
सिर्फ यादें बन के रह जायेगी…
कभी न भूलनेवाला….
कहां गलती कर बैठा मैं?
क्यों किया?
कैसे हो गया ये सब???

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