चापलूसी / कविता

चापलूसी !
माना एक बला है
किन्तु गज़ब की कला है
जो –
हर किसी को आती नहीं
और
कइयों की जाती नहीं |
ना योग्यता
ना डिग्री
ना पूंजी
ना पहचान का पर्चा
कुछ खास नहीं मापदंड !
निशुल्क
बिलकुल निशुल्क
सिर्फ और सिर्फ –
लपरता जीभ की
दीनता चेहरे की
दांतों का खिसियाना
आँखों का गड़ना
हाथ साक्षात दंडवत |
बस यही सब
मौके से दौड़ जाना
असफलता का ठीकरा
औरों के सिर फोड़ना
यही मंत्र रखना –
यस बॉस, यस बॉस !!
दुनिया इन्हीं की
यही पनपते हैं |
इनकी दोस्ती पुलिस जैसी
अच्छी भी
बुरी भी |
साथ रहो या
बचके
लेकिन- ज़रा सोचके |
आपका निर्णय
आपकी ज़िंदगी !!

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया DK Nivatiya 13/08/2015
    • mkkuldeep mahesh kumar kuldeep 14/08/2015
  2. रोशनी यादव रोशनी यादव 13/08/2015
    • mkkuldeep mahesh kumar kuldeep 14/08/2015
  3. Gaurav 23/05/2016
  4. babucm babucm 23/05/2016

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