लगता नहीं दिल

लगता नहीं यह अपना शहर तुमसे क्या कहु
झुलस रहा दिल आठो पहर तुमसे क्या कहु
लगायी है हमने हरियाली घर के चारो तरफ
ठंडक फिर भी न पहुंचे इस दिल को
तुमसे क्या कहु
लगता नहीं यह अपना शहर तुमसे क्या कहु
झुलस रहा दिल आठो पहर तुमसे कहु

बोया है बीचो बीच एक पेड़
छाया हमी को न मिले तुमसे क्या कहु
सफर के रस्ते में मुसाफिर बन के तुम मिले
अब हो गए हो हमसफ़र तुमसे क्या कहु
लगता नहीं यह अपना शहर तुमसे क्या कहु
झुलस रहा दिल आठो पहर तुमसे कहु

कनक श्रीवास्तवा

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  1. Chirag Raja 13/08/2015

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