आशा

मैंने अपनी हथेलिया फैलाई
तो लगा मेरे हाथ काफी छोटे है
और अंजुरी और भी छोटी
और सामने फैला है भविष्य का सागर
निःसीम अनंत
मैंने अपनी आँखे उठाई
ऊपर नीला नीला आसमान
गहरा और फैला हुआ
लेकिन मेरी यह दो आँखे
मात्र दो ही तो है
कैसे इनमे वह सब समाएगा
कैसे इनमे वह सब सिमटेगा
टूटे शीशो का ढेर
छोढ़ आया हूँ
जंग लगे किवारो को तोड़ आया हूँ
उलझी पड़ी जिंदगी को सवारने आया हूँ
मुझे पता है मेरी मंजिल का
सामने भविष्य का सागर लहरा रहा है
मुझे अपने बाहो में बुला रहा है
अब्ब नहीं रुकना है आकाश की उस नीलिमा
को जीवन में उतारना चाहता हूँ
आने वाला मेरा कल दस्तक दे रहा है
दस्तक हाँ दस्तक
और आस्था भरे मेरे यह दोनों हाथ
किवाड़ के पल्ले खोल रहे है
और सागर की लेहरो का शोर मेरे अंदर समां रहा है
मैंने अपनी आँखे उठाई
तो लगा आज मै बादलो के पार उतर आया

कनक श्रीवास्तव

Leave a Reply