गीत-शकुंतला तरार- ”माँ ”

^^माँ^^
दुनिया में जितनी उपमाएँ
माँ के आगे सब फीकी हैं
क्या होती कैसे होती है
माँ तो बस माँ ही होती है ॥

माँ है तो धरती चलती है
माँ है तो प्रकृति पलती है
माँ जीवन है माँ आँगन है
माँ बादल है माँ सावन है
दर्पण बन गढ़ती प्रतिमाएँ
माँ जननी बस माँ होती है॥

सुप्त निर्झर बहने लगता
चरण धूलि जहाँ माँ के पड़ते
फिर शुभमय शब्दों में ढलकर
वेद पुराण अध्याय हैं गढ़ते
ग्रंथों में उसकी रचनाएँ
मातृभूमि वही माँ होती है॥

माँ संघर्ष है माँ उत्कर्ष है
माँ प्रेरणा जीवन का हर्ष है
हर मुश्किल में साथ निभाती
हर विपदा को धूल चटाती
प्रगति पथ की वह कविताएँ
स्नेह का सोता माँ होती है॥
शकुंतला तरार

2 Comments

  1. kiran kapur gulati Kiran kapur Gulati 18/08/2015
  2. kiran kapur gulati Kiran kapur Gulati 18/08/2015

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