गीत-शकुंतला तरार ‘‘कारे कजरारे बादल’’

‘‘कारे कजरारे बादल’’
कारे कजरारे बादल ने
पीली पीली सरसों से
कुट्टी करने की ठानी है ।

हरी दूब की फुनगियों पर
ओस की बूंदों ने
करली अपनी मनमानी है
कुट्टी करने की ठानी है ।

प्यास हुई अब वासंती
रंग-बिरंगे फूलों पर
तितलियों की छेड़खानी है
कुट्टी करने की ठानी है ।

स्वप्न हुये मृदु मलयानिल
मकरंद सुगंध समीर बहे
रतनारे नैनों की सानी है
कुट्टी करने की ठानी है ।

बांध गए हिरनी के पावों घुंघरू
दर्पीले मौसम के हाथों ने
यह जीवन आनी जानी है
कुट्टी करने की ठानी है ।
शकुंतला तरार

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