सुहाना बचपन

अपना बचपन भी कितनासुहाना था
रोने की वजह न थी
न हँसने का बहाना था
माँ की मार हो,
या हो पिता का दुलार.
फिर भी सभी का प्रेम हमारे लिए पुराना था
ग़म का तो हमें पता नही था
न ही किसी से कोई फसाना था
अपना बचपन भी कितना सुहाना था |
पाठशाला में मस्ती ..
घर में मस्ती…
अपनी बस्ती से प्रेम पुराना था..
वो बचपन का दिन भी
कितना सुहाना था…
खेल का मैदान हो
या हो फूलों का बागान
हमको तो गाना था
सिर्फ़ अपने गान..
खेत, खलिहान, वन और उपवन..
खुला हुआ आसमान जैसा था
बचपन में अपना मन..
कभी कभी हम खो जाते थे
सपनो की दुनिया में…
चाँद को भी पा लेते थे
अपनों की दुनिया में…
तितली भी प्यारी लगती थी..
चिड़िया की चीं चीं भी खूब भाती थी…
दादी माँ की हो शेर की डरावनी कहानी..
या हो राजा रानी की ज़ुबानी..
मन को सब भा जाती थी..
क्यों हो गये हम इतने बड़े?
इससे अच्छा तो वो
अपने बचपन का जमाना था….
अपना बचपन भी कितना सुहाना था |

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