ik haqikat … dargah …. by tushar gautam

हक़ीक़त जहां की ……………

१ मैं अपने अपनों का गम खा रहा था
भूल गया था मौत सबकी आती है

२ वो मुझसे बार बार जात पूछ रहा था
पर उसे दिखा नहीं इंसान की औलाद हु

३ धरती को जन्नत बनाने बनाया था इंसान को
वही खुद की खिदमद कर जन्नत मांग रहा है

४ दरगाह पर चादर चढ़ाने सारा आलम जा रहा था
पर मुझे ठिठुरता हुआ किसी ने ना देखा

५ मंजिल को धुंध रहा था मैं अपनी लकीर में
तो मुकाम के नाम पर कब्रिस्तान लिखा था

६ ज़िंदगी भर गुरुर रहा मुझे अपने रुतबे का
मेरी अपनी मौत पर गैरो ने उठाया था

७ मेरे ज़नाज़े की महफ़िल में मेरे अपने आये थे
पूछ रहे थे वक़्त कितना और है दफनाने में

८ जब सारे सगे मुझे गड्डे में दाल रहे
मौत का फ़रिश्ता तब मेरे साथ था

तुषार गौतम “नगण्य”

2 Comments

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari"Indwar" 10/08/2015
    • Tushar Gautam गौतम "नगण्य" 11/08/2015

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