रात भर सर्द हवा चलती रही

रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने अलाव जलाया
मैंने मांझी से किये खुश्क सी शके काटी
तुम ने भी गुजरे हुए लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंबे जेबो से निकाली सभी सुखी नज्मे
तुम ने भी कांपते हाथो से मुरझाये हुए खत खोले

अपने इन आँखों से मैंने क्या क्या मंजर तोड़े
और हाथो से बासी लकीरे फेंकी
तुम ने पलकों में नमी जो सुख गयी थी गिरा दी
रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
काट के डाल दिया जलते अलाव में उसे
रात भर फूको से हर लौ जगाये रखा
और दो जिस्मो में ईंधन को जलाये रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा मैंने
रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने अलाव जलाया
रात भर सर्द हवा चलती रही

कनक श्रीवास्तवा

Leave a Reply