ज़िदगी का भरोसा नहीं

क्या भरोसा है इस ज़िंदगी का,
साथ देती नही है किसी का..
घर परिवार धन दौलत
सब यहीं छूट जाना है..
कौन कब इस जहाँ से चला जायेगा..
क्या ठिकाना है..
जब तक इंसान जीता है ..
अपने पराये से भेद भाव करता है..
आख़िर क्यों हम लोगों का
भेद भाव से गहरा नाता है..
इंसान ऐसा करते हुए
क्यों नही शरमाता है..
मरते समय 4 कंधों पर ले जाने के लिए
हर कोई अपना पराया ही काम आता है..
इंसान इतना भी नादान नहीं की
वो ये नही जानता है..
फिर भी वो अपने को
खुदा से बड़ा मानता है..
मेरा दिल भेद भाव की बात
सोच कर सिहर जाता है..
क्या भरोशा है इस ज़िंदगी का,
की, कब,कौन,कैसे
इस जहाँ से चला जाता है |