राहें कहाँ हँसती कभी?

ना फासला हुआ कभी
ना हौसला बँटा कभी
उस राह का मैं राही हूँ
रहगुजर जहाँ मिली ना कभी।
रास्ते श्मशान से
मंज़िलें अन्जान ही
हर कदम दुश्वारियाँ हैं
और कोई पहचान नहीं।
रूह कभी रोने लगती
और कभी मुसकाती है
पर सफ़र चुपचाप है
राहें कहाँ हँसती कभी?
मैनें भी डगर वही चुनी
जो कभी रूकती नहीं
चलती चली ही जा रही
लौटती कहाँ कहीं?
© राजीव उपाध्याय

2 Comments

  1. Tushar Gautam गौतम "नगण्य" 09/08/2015
    • rajeevupadhyay Rajeev Upadhyay 10/08/2015

Leave a Reply