प्रेम-गंगा / गज़ल

दिल से अहम जला के मिल |

कद से कद मिला के मिल ||

फिर से दोस्त बनेंगे सब,

बीती बात भुला के मिल ||

रखा है जो दिल में खींच,

लकीरें वो मिटा के मिल ||

छलक उठेगा नूर नया,

सबसे खिलखिला के मिल ||

हवा भी न हो दरमियाँ,

दायरे सब हटा के मिल ||

राह चलते मिले खूब,

कभी तो घर बुला के मिल ||

मैं भी पाक तू भी पाक,

प्रेम-गंगा बहा के मिल ||

:- महेश कुमार कुलदीप ‘माही’

One Response

  1. Lalitkuldeep lalit kuldeep 09/08/2015

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