सिसकता रहा रात भर

साँसे थक थक कर चलती रही रात भर
रौशनी यूँ ही पिघलती रही रात भर
एक कोहरा सा शीशे पर छाया रहा
बर्फ पर्वत पर पिघलती रही रात भर
दर्द खोने का सुबह तक जागा किया
पीड़ा रुक रुक कर चलती रही रात भर
साँसे थक थक कर चलती रही रात भर
रौशनी यूँ ही पिघलती रही रात भर

चाँद बादल के टुकड़े में छिप छिप गया
चांदनी ढूंढा करता रात भर |
धुप थक कर अंधेरो में गूम हो गयी
रात तिल तिल के ढलती रही रात भर
साँसे थक थक के चलती रही रात भर
रौशनी यूँ ही पिघलती रही रात भर
कोई यादो के जंगल के भटका किया
चांदनी जैसे झरती रही रात भर
ओस हाथो में ले चेहरा अपना धोता रहा रात भर
मांग तेरी तारो से भरता रहा रात भर
साँसे थक थक कर चलती रही रात भर
रौशनी यूँ ही पिघलती रही रात भर

सुबह सूरज से मिलने की एक चाह ने
रात बनता संवरता रहा रात भर
कोई बंजारा था कल जो ठहरा यहाँ
एक पल दम लिया फिर चला राह पर
और साँसों के जलते अलाव पर
आंच रोता सिसकता रहा रात भर
साँसे थक थक कर चलती रही रात भर
रौशनी यूँ ही पिघलती रही रात भर

कनक श्रीवास्तव

One Response

  1. Dr. Nitin Kumar pandey Dr. Nitin Kumar pandey 10/08/2015

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