पहली मुलाक़ात

वो वस्ल-ए-यार का लम्हा अभी तक याद है मुझको
बेसब्र दिल का वो धक से धड़कना याद है मुझको

दीदार-ए-यार को मुन्तज़िर डूबी हुई आँखें
मुख़ातिब होते ही हैरान होना याद है मुझको

मिले जब हाथ दोनों के रगों में है लहू जाना
कांपते होटों की वो थरथराहट याद है मुझको

कभी चुपचाप शरमाना कभी खुद ही लिपट जाना
किसी बेबाक  दिल की वो शरारत याद है मुझको

गिरा के ज़ुल्फ़ शानो पर दबे होठो से गुफ़्तगू
मुसलसल हमको तेरा तकते रहना याद है मुझको

उल्फत-ए-इतिराफ़ का कभी जब ज़िक्र आया तो
तेरे चेहरे की रंगत सुर्ख होना याद है मुझको

गुज़ारे चंद लम्हे दोपहर के साथ जो हमने
तेरा बेबाक़ होकर खिलखिलाना याद है मुझको

शाम-ए-रुख़सत दबे लहजे में मुझको अलविदा कहना
तेरी आँखों से आंसू का छलकना याद है मुझको

–नितिन

4 Comments

  1. Priya 28/07/2017
    • Dr. Nitin Kumar pandey Dr. Nitin Kumar pandey 06/01/2018
  2. C.M. Sharma babucm 28/07/2017
    • Dr. Nitin Kumar pandey Dr. Nitin Kumar pandey 06/01/2018

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