* बेहया *

कहते हैं हमें बेहया
उन्हें शर्म काहा आया
चले आते हैं मुँह उठा कर
दिखाते पैसा और तागत।

उधर फिरते हैं , बघारते
इधर हैं दाँत चिहारते
उधर उनकों छुत है लगती
यहाँ हैं तलवा चाटते।

मांगने कि इन्हे आदत पड़ी
मंदिर, मस्जीद, गुरुद्वारा चर्च ए जाते
या हमारे पास हैं आते
ऊपर से दाता कहलाते।

अपनी छुपाते हमारी बताते
अपने ऊपर बहुत इठलाते
अगर वे सही हैं तो
हमसे आँख क्यों नहीं मिलाते।

आप हि बताए हमें सुनाए
किसकी निर्मल है
दिल दिमाग और काया
कहते हैं वो हमें बेहया ।

2 Comments

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari"Indwar" 09/08/2015
    • नरेन्द्र कुमार नरेन्द्र कुमार 09/08/2015

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