दहेज के चलते मैं मर जाऊँ ।

जी चाहे कुछ कर मैं जाऊँ
अब हद से आगे बढ़ मैं जाऊँ
यह जिंदगी अब छोड़ मैं जाऊँ
जी चाहे कुछ कर मैं जाऊँ ।

अब ज्यादा मैं जी न पाऊँ
परेशान जब मैं हो जाऊँ
यह दर्द मैं किसको बताने जाऊँ
जी चाहे कुछ कर मैं जाऊँ ।

जी चाहे कुछ कर मैं जाऊँ
दहेज के चलते मैं मर जाऊँ
शादी के नाम पे मैं बिक जाऊँ
क्यों सारा जीवन नर्क मे बिताऊँ
जी चाहे कुछ करर मैं जाऊँ ।

” पति तो ऐसा चाहिए , जो सुख-दुख साथ निभाए ।
दहेज प्रथा से घृणा करे, केवल साथी संग लिए जाए ॥”

संदीप कुमार सिंह ।

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